तो फिर रोने को क्या होता

खुशी हमदम अगर होती तो फिर रोने को क्या होता
मुझे वो मिल गयी होती तो फिर खोने को क्या होता
वो मुझसे दूर ना होती मै उससे दूर ना होता
ये अनहोनी ना होती तो फिर होने को क्या होता
थक कर जब आता हू तो कंधे चीख उठते है
ये जीवन बोझ ना होता तो फिर ढोने को क्या होता
पड़े रहते यू ही बंजर तुम्हारे खेत सदियो तक
मै मिट्टी में ना मिला होता तो फिर बोने को क्या होता
                       ©A. M_TURAZ

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