वो हमे बेघर कर रहे हैं l मेरी कविता

बने बनाए घर को खंडहर कर रहे हैं
वो हमे खुद के घर से बेघर कर रहे हैं
बाशिंदे है हम खुले आसमां के
वो मेरे गाँव को अब शहर कर रहे है
वो हमे.......

पुरखों की इबारत को मिटाने की
कोसीश कोई एक नहीं
हर एक घर कर रहे हैं
वो हमे  खुद के घर से बेघर कर रहे हैं

ईटों से नहीं जास्बातो से बनाया था
तब जाकर मकान से वो घर कहलाया था
मेरे पोते उसे अब जर जर कर रहे है
वो मेरे ख़ुद के घर से बेघर कर रहे हैं l
                ©Rohit_yadav 

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